महिला की इच्छा के खिलाफ जबरन डिलीवरी नहीं सुप्रीम कोर्ट: 7 महीने की प्रेग्नेंट नाबालिग को दी अबॉर्शन की अनुमति, कोर्ट ने सुरक्षित और कानूनी प्रोसेस पर दिया जोर

25 अप्रैल 2026
7 महीने की प्रेग्नेंट नाबालिग को दी अबॉर्शन की अनुमति, कोर्ट ने सुरक्षित और कानूनी प्रोसेस पर दिया जोर

दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में सात महीने से ज्यादा की प्रेग्नेंट 15 साल की नाबालिग लड़की को अबॉर्शन की अनुमति दे दी है। कोर्ट ने साफ कहा कि यह महिला की इच्छा और उसके अधिकारों का मामला है। किसी को भी उसकी मर्जी के खिलाफ डिलीवरी के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। जस्टिस बीवी नागरत्ना और उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में महिला के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देना जरूरी है।

यह मामला एक 15 साल की नाबालिग लड़की से जुड़ा है जो आपसी सहमति से बने संबंध के बाद प्रेग्नेंट हुई थी। उसकी मां ने मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट के तहत तय समयसीमा से आगे जाकर अबॉर्शन की अनुमति मांगी थी। लड़की खुद भी प्रेग्नेंसी जारी नहीं रखना चाहती थी। कोर्ट ने उसकी इच्छा को सबसे महत्वपूर्ण माना। बेंच ने कहा कि किसी भी महिला, खासकर नाबालिग, को उसकी मर्जी के खिलाफ गर्भ जारी रखने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

मानसिक तनाव और पढ़ाई पर असर

याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट को बताया कि यह प्रेग्नेंसी नाबालिग के लिए मानसिक रूप से बेहद तनावपूर्ण साबित हो रही है। उसकी पढ़ाई प्रभावित हो रही है। उसके अंदर डिप्रेशन के लक्षण भी दिखे हैं। यहां तक कि उसने आत्महत्या की कोशिश भी की थी। इन सभी पहलुओं को देखते हुए कोर्ट ने मामले को गंभीरता से लिया। कोर्ट ने माना कि ऐसी स्थिति में लड़की को मजबूर करना उसके लिए खतरनाक हो सकता है।

गोद लेने के विकल्प पर कोर्ट सख्त

सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल ने सुझाव दिया कि बच्चे को सेंट्रल अडॉप्शन रिसोर्स अथॉरिटी के जरिए गोद दिलाया जा सकता है। इससे लड़की और परिवार की पहचान सुरक्षित रहेगी। आर्थिक मदद देने की भी बात कही गई लेकिन कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया। जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि आर्थिक मदद या गोद लेने का विकल्प किसी महिला को मजबूर करने का आधार नहीं बन सकता। महिला की इच्छा सबसे ऊपर है।

प्रजनन अधिकारों पर स्पष्ट टिप्पणी

कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा कि प्रजनन संबंधी फैसले लेना महिला का व्यक्तिगत अधिकार है। यह उसकी स्वतंत्रता और गरिमा का हिस्सा है। अगर किसी महिला को जबरन गर्भ जारी रखने को कहा जाता है, तो यह उसके अधिकारों का उल्लंघन होगा। कोर्ट ने यह भी कहा कि नाबालिग के मामले में यह और ज्यादा संवेदनशील हो जाता है। ऐसे मामलों में कोर्ट को बेहद संतुलित और मानवीय दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।

इलीगल अबॉर्शन के खतरे पर चिंता

कोर्ट ने यह भी चेतावनी दी कि अगर महिलाओं को जबरन गर्भ जारी रखने के लिए मजबूर किया गया तो वे इलीगल तरीकों का सहारा ले सकती हैं। इससे उनकी जान को खतरा हो सकता है। कोर्ट ने कहा कि यह स्थिति समाज और स्वास्थ्य व्यवस्था दोनों के लिए खतरनाक होगी। इसलिए जरूरी है कि सुरक्षित और कानूनी विकल्प उपलब्ध कराए जाएं।

एम्स में मेडिकल निगरानी में होगा अबॉर्शन

एम्स दिल्ली में इस नाबालिग का अबॉर्शन कराया जाएगा। कोर्ट ने निर्देश दिया कि पूरी प्रक्रिया मेडिकल सुपरविजन में हो। सभी जरूरी सावधानियां बरती जाएं। लड़की की सेहत को प्राथमिकता दी जाए। यह सुनिश्चित किया जाए कि उसे किसी तरह की अतिरिक्त परेशानी न हो।

पहले भी दे चुका है ऐसे फैसले

सुप्रीम कोर्ट पहले भी ऐसे मामलों में अहम फैसले दे चुका है। 2024 में 14 साल की रेप पीड़िता को 30 हफ्ते की प्रेग्नेंसी में अबॉर्शन की अनुमति दी गई थी। वहीं 2017 में एक 33 साल की महिला को भ्रूण में गंभीर बीमारी के कारण 26 हफ्ते की प्रेग्नेंसी खत्म करने की इजाजत मिली थी। हालांकि एक मामले में 32 हफ्ते की प्रेग्नेंसी को खत्म करने की अनुमति नहीं दी गई थी क्योंकि इससे मां और बच्चे दोनों की जान को खतरा था।

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