पहलगाम हमला : एक साल बाद भी जिंदा है दर्द, अपनों की चीखें आज भी नहीं देती सुकून

22 अप्रैल 2026
एक साल बाद भी जिंदा है दर्द, अपनों की चीखें आज भी नहीं देती सुकून

पहलगाम हमले को एक साल हो चुका है। हालात सामान्य दिखते हैं। लेकिन पीड़ित परिवारों के दिलों में दर्द आज भी ताजा है। यह घटना सिर्फ एक हमला नहीं थी, बल्कि कई जिंदगियों को हमेशा के लिए बदल देने वाला जख्म है। जिसे वक्त भी पूरी तरह भर नहीं पाया है।

22 अप्रैल 2025 की वह दोपहर आज भी लोगों के दिलों में जख्म बनकर जिंदा है। पहलगाम की खूबसूरत वादियां उस दिन खून से लाल हो गई थीं। इस कायराना आतंकी हमले में 26 निर्दोष लोगों की जान चली गई थी। एक साल बीत चुका है।

365 दिन गुजर गए हैं। समय आगे बढ़ गया है। पर्यटन फिर से पटरी पर लौट आया है। बाजार फिर गुलजार हैं। लेकिन जिन लोगों ने अपने अपनों को खोया, उनके लिए वक्त जैसे वहीं थम गया है। उनकी यादें आज भी ताजा हैं। उनके कानों में आज भी गोलियों की आवाज और अपनों की चीखें गूंजती हैं।

“सब खत्म हो गया” - आरती का दर्द

इस हमले में अपने पिता को खोने वाली आरती आज भी उस मंजर को भूल नहीं पाई हैं। वह उस वक्त अपने परिवार के साथ छुट्टियां मनाने पहलगाम गई थीं। उनके पिता रामचंद्रन उनके सामने ही गोलियों का शिकार हो गए थे। आरती उस घटना की चश्मदीद हैं। एक साल बाद जब उनसे बात की गई, तो उनके शब्द कम और खामोशी ज्यादा थी। उन्होंने कहा, “अब कहने के लिए कुछ बचा ही नहीं है। सब खत्म हो गया।” उनकी आवाज में दर्द साफ महसूस होता है। वह आज भी उस सदमे से उबर नहीं पाई हैं। फिलहाल वह विदेश में काम कर रही हैं और खुद को संभालने की कोशिश कर रही हैं।

“आम लोगों को मारकर क्या मिला?” संगीता का सवाल

हमले में जान गंवाने वाले संतोष गनबोटे की पत्नी संगीता गनबोटे आज भी उस दिन को याद कर सिहर उठती हैं। उनके लिए वह दिन किसी बुरे सपने जैसा है, जो खत्म ही नहीं होता। वह कहती हैं कि आतंकियों को यह समझना चाहिए कि अगर उनकी लड़ाई सरकार से है, तो आम लोगों को निशाना क्यों बनाया जाता है। मासूमों की जान लेकर उन्हें क्या हासिल होता है। संगीता ने यह भी कहा कि अब स्कूलों में बच्चों को ऐसी परिस्थितियों से निपटने की ट्रेनिंग दी जानी चाहिए। ताकि अचानक होने वाले हमलों में लोग खुद को बचा सकें।

“आतंक खत्म होगा, तभी मिलेगा न्याय” – प्रगति जगदाले

पुणे की रहने वाली प्रगति जगदाले ने इस हमले में अपने पति संतोष जगदाले को खो दिया। एक साल बाद भी उनका दर्द कम नहीं हुआ है। वह कहती हैं कि उन्हें असली न्याय तब मिलेगा, जब देश पूरी तरह आतंकवाद मुक्त हो जाएगा। उन्होंने सरकार द्वारा किए गए जवाबी एक्शन की सराहना की लेकिन यह भी कहा कि आतंक का पूरी तरह खात्मा जरूरी है। तभी ऐसे हादसे रुकेंगे और लोगों को सच्चा सुकून मिलेगा।

शहीदों की याद में बना ट्रस्ट

इस हमले में जान गंवाने वाले कानपुर के शुभम द्विवेदी की याद अब एक मिशन बन गई है। उनकी पत्नी ऐशान्या द्विवेदी ने उनके नाम पर एक ट्रस्ट बनाया है। इस ट्रस्ट का मकसद उन गुमनाम वीरों को पहचान दिलाना है, जिन्होंने देश के लिए कुर्बानी दी, लेकिन उन्हें कभी सम्मान नहीं मिला। ऐशान्या कहती हैं कि यह उनके पति को सच्ची श्रद्धांजलि है। उन्होंने अपने दर्द को ताकत बनाया है। अब वह समाज सेवा के जरिए आगे बढ़ रही हैं। शुभम अपने परिवार के इकलौते बेटे थे। उनकी शादी को सिर्फ दो महीने ही हुए थे। ऐसे में उनकी मौत ने पूरे परिवार को तोड़ दिया। उनके पिता आज भी इस सदमे से उबर नहीं पाए हैं। लेकिन ऐशान्या ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपने पति के नाम को जिंदा रखने और दूसरों की मदद करने का रास्ता चुना है।

बैसरन घाटी को फिर खोलने की मांग

हमले के बाद से बंद पड़ी बैसरन घाटी को दोबारा खोलने की मांग तेज हो गई है। व्यापारिक संगठनों का कहना है कि इससे हजारों लोगों की आजीविका जुड़ी है। उन्होंने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर घाटी को फिर से खोलने की अपील की है। उनका कहना है कि सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम के साथ पर्यटन को फिर से पूरी तरह बहाल किया जाना चाहिए।

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