ट्रांसजेंडर कानून पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: 2026 संशोधन को चुनौती, केंद्र और राज्यों से मांगा जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2026 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई शुरू कर दी है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने केंद्र सरकार के साथ सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने साफ कहा है कि सभी पक्ष 6 हफ्ते के भीतर अपना जवाब दाखिल करें। यह मामला अब और गंभीर माना जा रहा है, क्योंकि इसकी अगली सुनवाई तीन जजों की बड़ी बेंच करेगी। फिलहाल कोर्ट ने किसी तरह का अंतरिम आदेश देने से इनकार किया है, क्योंकि यह कानून अभी लागू नहीं हुआ है। इसके बावजूद कोर्ट ने इस मुद्दे को संवेदनशील और महत्वपूर्ण बताते हुए जल्द सुनवाई का संकेत दिया है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने नए संशोधन का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा कि यह कानून ट्रांसजेंडर व्यक्तियों से उनकी पहचान खुद तय करने का अधिकार छीनता है। उन्होंने 2014 के ऐतिहासिक एनएएलएसए फैसले का हवाला दिया। उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने ‘सेल्फ आइडेंटिफिकेशन’ को मौलिक अधिकार माना था। सिंघवी ने दलील दी कि यह संशोधन सीधे-सीधे उस फैसले के खिलाफ जाता है। सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने भी इस मुद्दे पर सवाल उठाए। उन्होंने पूछा कि क्या इस अधिकार का दुरुपयोग नहीं हो सकता? क्या कुछ लोग गलत तरीके से ट्रांसजेंडर बनकर लाभ नहीं उठा सकते? इस पर सिंघवी ने जवाब दिया कि फिलहाल इस समुदाय के लिए कोई आरक्षण लागू नहीं है, इसलिए दुरुपयोग की आशंका बहुत कम है। उन्होंने यह भी कहा कि कुछ मामलों में संभावित गलत इस्तेमाल के आधार पर पूरे समुदाय के अधिकार नहीं छीने जा सकते।
मेडिकल बोर्ड की शर्त से बढ़ी चिंता
नए संशोधन के तहत ट्रांसजेंडर पहचान के लिए मेडिकल इवैल्यूएशन जरूरी कर दिया गया है। यानी अब व्यक्ति की खुद की पहचान के बजाय डॉक्टरों की जांच को आधार बनाया जाएगा। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह निजता और गरिमा के अधिकार का उल्लंघन है। कोर्ट में बताया गया कि अब जिला मजिस्ट्रेट पहचान पत्र जारी करने से पहले मेडिकल बोर्ड की सिफारिश देखेंगे। इससे प्रक्रिया जटिल हो जाएगी। साथ ही, यह ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचा सकता है। जस्टिस बागची ने कहा कि विधायिका कानून बदल सकती है, लेकिन यह बदलाव संवैधानिक सीमाओं के भीतर होना चाहिए।
हार्मोनल थैरेपी और क्रिमिनलाइजेशन पर बहस
सीनियर वकील अरुंधति काटजू ने कोर्ट को बताया कि इस संशोधन के डर से कई ट्रांसजेंडर लोगों ने अपनी हार्मोनल थैरेपी रोक दी है। उन्होंने कहा कि इससे उनकी मानसिक और शारीरिक स्थिति पर असर पड़ रहा है। सिंघवी ने भी कहा कि यह संशोधन अप्रत्यक्ष रूप से लोगों को अपराधी बना सकता है। हालांकि केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सफाई दी। उन्होंने कहा कि सरकार का उद्देश्य केवल जबरन लिंग परिवर्तन और बच्चों के साथ होने वाले अत्याचार को रोकना है। उन्होंने कहा कि यह कानून किसी की पहचान छीनने के लिए नहीं, बल्कि सुरक्षा देने के लिए लाया गया है।
क्या है एनएएलएसए फैसला और नया बदलाव ?
2014 में सुप्रीम कोर्ट ने एनएएलएसए केस में ऐतिहासिक फैसला दिया था। कोर्ट ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को ‘थर्ड जेंडर’ के रूप में मान्यता दी थी। साथ ही कहा था कि हर व्यक्ति को अपनी लैंगिक पहचान खुद तय करने का अधिकार है। इसके लिए किसी मेडिकल सर्टिफिकेट या सर्जरी को जरूरी नहीं माना गया था। इसे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा के अधिकार से जोड़ा गया था। लेकिन 2026 के संशोधन में कई बड़े बदलाव किए गए हैं। अब ट्रांसजेंडर की परिभाषा में मेडिकल और बायोलॉजिकल आधार जोड़े गए हैं। जेंडर अफर्मिंग सर्जरी के बाद सर्टिफिकेट लेना अनिवार्य कर दिया गया है। इसके अलावा सजा के प्रावधानों को लेकर भी भेदभाव के आरोप लगे हैं।
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