अमेरिका-ईरान के बीच शांति समझौता: 19 जून को जेनेवा में हस्ताक्षर संभव, 47 साल बाद बड़े कूटनीतिक बदलाव की आहट

इंटरनेशनल राजनीति में बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। जहां अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से जारी तनाव और सैन्य टकराव को समाप्त करने पर सहमति बन गई है। दोनों देशों ने एक प्रारंभिक शांति समझौता को अंतिम रूप दे दिया है। जिसके तहत रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज को फिर से खोलने पर सहमति बनी है। यह वही मार्ग है, जिससे दुनिया के बड़े हिस्से का कच्चा तेल और ऊर्जा आपूर्ति गुजरती है। समझौते की घोषणा के बाद वैश्विक बाजारों में भी तेजी देखी गई और निवेशकों में आशावाद बढ़ा है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने सोशल मीडिया पर घोषणा करते हुए कहा कि ईरान के साथ समझौता लगभग पूरा हो चुका है। अब दुनिया के जहाजों को “अपने इंजन चालू कर तेल प्रवाह बहाल करने” का समय है। ट्रम्प ने ईरानी बंदरगाहों पर लगी अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी हटाने की भी मंजूरी दे दी है। हालांकि बाद में यह स्पष्ट किया गया कि हॉर्मुज स्ट्रेट को पूरी तरह तभी खोला जाएगा जब संभावित खतरों और बारूदी सुरंगों को निष्क्रिय कर दिया जाएगा।
ईरान की शर्तें और 60 दिन की वार्ता का ढांचा
ईरान की ओर से उप विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने बयान दिया है। समझौते के लागू होने के बाद 60 दिनों की नई वार्ता शुरू की जाएगी। लेकिन यह प्रक्रिया इस बात पर निर्भर करेगी कि अमेरिका पहले अपनी तीन प्रमुख शर्तों नौसैनिक नाकेबंदी समाप्त करना, सैन्य कार्रवाई रोकना और ईरानी फ्रीज्ड फंड जारी करना को पूरा करता है या नहीं। ईरान का दावा है कि समझौते में आर्थिक प्रतिबंधों में ढील और अरबों डॉलर की संपत्तियों को जारी करने की बात भी शामिल है। हालांकि अमेरिका ने इस पर आपत्ति जताई है।
जेनेवा में ऐतिहासिक हस्ताक्षर की तैयारी
इस समझौते पर औपचारिक हस्ताक्षर 19 जून को स्विट्जरलैंड के जेनेवा में होने की संभावना है। जिसमें शहबाज शरीफ समेत कई वैश्विक नेता मध्यस्थ भूमिका निभा सकते हैं। यह बैठक यदि सफल रहती है तो यह लगभग 47 वर्षों बाद अमेरिका-ईरान संबंधों में सबसे बड़ा कूटनीतिक मोड़ माना जाएगा।
वैश्विक प्रतिक्रिया और आर्थिक असर
दुनिया भर के देशों ने इस संभावित शांति समझौते का स्वागत किया है। ब्रिटेन, कतर, तुर्किये और ऑस्ट्रेलिया सहित कई देशों ने इसे मध्य पूर्व में स्थिरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने मध्यस्थ देशों की भूमिका की सराहना की है। समझौते की खबर के बाद एशिया और अमेरिकी शेयर बाजारों में तेज उछाल दर्ज किया गया। जिससे यह संकेत मिला कि ऊर्जा आपूर्ति को लेकर वैश्विक चिंता में कमी आई है।
रणनीतिक महत्व और आगे की राह
अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा है कि यदि यह समझौता लागू होता है, तो यह मध्य पूर्व की भू-राजनीतिक तस्वीर को अगले कई दशकों तक बदल सकता है। हालांकि दोनों देशों के बयानों में अभी भी कई बिंदुओं पर मतभेद बने हुए हैं। जिससे यह स्पष्ट है कि अंतिम समझौते तक पहुंचने के लिए कूटनीतिक चुनौतियां अभी भी बरकरार हैं।
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