सब्जियों के छिलकों से तैयार करें ‘काला सोना’: किचन वेस्ट बन सकता है पौधों के लिए अमृत, 2 से 3 महीने में खाद तैयार

निवेदिता चंद|1 घंटा पहले
किचन वेस्ट बन सकता है पौधों के लिए अमृत, 2 से 3 महीने में खाद तैयार

घरों में प्रतिदिन निकलने वाले सब्जियों और फलों के छिलके, बची हुई चायपत्ती तथा अन्य जैविक कचरे को अक्सर बेकार समझकर कूड़ेदान में फेंक दिया जाता है। लेकिन यही किचन वेस्ट पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ पौधों की बेहतर वृद्धि का भी आधार बन सकता है। वर्तमान समय में गार्डनिंग के शौकीनों के बीच घरेलू कंपोस्टिंग का चलन तेजी से बढ़ रहा है। जिसमें रसोई से निकलने वाले जैविक कचरे को प्राकृतिक खाद में बदला जाता है। यही खाद ‘काला सोना’ के नाम से जानी जाती है। विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर एक्सपर्ट लोगों को घरेलू कचरे के पुनः उपयोग और जैविक खाद तैयार करने के लिए जागरूक कर रहे हैं।

पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि घरों से निकलने वाले गीले कचरे का बड़ा हिस्सा सीधे डंपिंग ग्राउंड तक पहुंच जाता है। जहां यह प्रदूषण और दुर्गंध का कारण बनता है। यदि इसी कचरे को घर पर ही खाद में बदल दिया जाए तो न केवल कूड़े की मात्रा कम होगी। पौधों को भी प्राकृतिक पोषण मिल सकेगा। यही वजह है कि शहरी क्षेत्रों में भी लोग अब बालकनी गार्डन और किचन गार्डन के लिए घर में बनी जैविक खाद का उपयोग करने लगे हैं।

क्या है ‘काला सोना’ और क्यों है खास?

‘काला सोना’ दरअसल उच्च गुणवत्ता वाली जैविक खाद है। जो सब्जियों के छिलकों, फलों के अवशेष, चायपत्ती और अन्य जैविक पदार्थों के प्राकृतिक रूप से विघटन के बाद तैयार होती है। यह खाद नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश और अन्य सूक्ष्म पोषक तत्वों से भरपूर होती है। पौधों की जड़ों को मजबूत बनाने, मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने और बेहतर उत्पादन देने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसके प्रयोग से रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता भी कम हो जाती है।

घर पर आसानी से तैयार की जा सकती है जैविक खाद

एक्सपर्ट्स के अनुसार घर पर कंपोस्ट तैयार करना बेहद आसान प्रक्रिया है। इसके लिए किसी पुराने मिट्टी के मटके या प्लास्टिक की बाल्टी का उपयोग किया जा सकता है। पात्र में हवा के आवागमन के लिए छोटे-छोटे छेद बनाए जाते हैं। सबसे नीचे सूखी पत्तियों, अखबार के टुकड़ों या सूखी मिट्टी की परत बिछाई जाती है। इसके बाद सब्जियों और फलों के छिलके, चायपत्ती तथा अंडे के छिलके डाले जाते हैं। हर परत के ऊपर सूखी मिट्टी या पत्तियां डालने से दुर्गंध नहीं आती। कीटों की समस्या भी कम होती है। इस पात्र को छायादार स्थान पर रखकर समय-समय पर हल्का पानी छिड़का जाता है। जिससे आवश्यक नमी बनी रहे। साथ ही हर चार से पांच दिन में सामग्री को उलट-पलट करना जरूरी होता है। ताकि पर्याप्त ऑक्सीजन मिलती रहे। लगभग दो से तीन माह में यह मिश्रण गहरे काले रंग की भुरभुरी खाद में बदल जाता है। जिसे सीधे पौधों में इस्तेमाल किया जा सकता है।

छिलकों से बन सकता है प्राकृतिक बायो-एंजाइम

केवल खाद ही नहीं, बल्कि नींबू, संतरा और मौसमी जैसे खट्टे फलों के छिलकों से प्राकृतिक बायो-एंजाइम भी तैयार किया जा सकता है। यह एक पर्यावरण अनुकूल और केमिकल मुक्त क्लीनर होता है। एक्सपर्ट बताते हैं कि खट्टे फलों के छिलके, गुड़ और पानी को निर्धारित अनुपात में मिलाकर एयरटाइट बोतल में रखा जाता है। लगभग तीन माह बाद तैयार होने वाला यह बायो-एंजाइम घर की सफाई, बाथरूम की धुलाई और पौधों के लिए जैविक कीटनाशक के रूप में उपयोग किया जा सकता है।

पर्यावरण संरक्षण में निभा सकता है बड़ी भूमिका

एक्सपर्ट्स का मानना है कि घरेलू स्तर पर कचरे का पुनर्चक्रण पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक प्रभावी कदम है। इससे लैंडफिल में जाने वाले कचरे की मात्रा घटती है। मिट्टी की गुणवत्ता सुधरती है। रासायनिक उत्पादों के उपयोग में कमी आती है। ऐसे में यदि लोग अपने घरों में निकलने वाले जैविक कचरे को संसाधन के रूप में देखना शुरू करें, तो यह न केवल उनके बगीचे को हरा-भरा बनाएगा। साथ ही पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण योगदान देगा।

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