इंटरव्यूनई सोच का स्पीड ब्रेकर है 'MCQ': पहले UPSC में जाना था ड्रीम, अब पॉलिटिक्स को सर्वोपरि मानते हैं यूथ

न्यू एजुकेशन पॉलिसी लागू होने के बाद हमारी शिक्षा व्यवस्था में व्यापक बदलाव हुए हैं। पहले जहां न्यूनतम शब्दों की अनिवार्यता के साथ छात्रों को लंबे-लंबे आंसर लिखने पड़ते थे, वहीं अब केवल एक टिक लगा देने या एक शब्द लिख देने मात्र से उनके जवाब पूरे हो जाते हैं। एक समय था जब आईआईटी और मेडिकल में करियर बनाने का क्रेज हुआ करता है, यूपीएससी में सिलेक्ट होना हर छात्र का ड्रीम रहता था। लेकिन लगातार बदलते शैक्षिक वातावरण में अब स्टूडेंट्स इंजीनियरिंग के बाद यूपीएससी और उसके बाद राजनीति में करियर बनाने को अपनी सफलता मानते हैं। एमसीक्यू मॉडल की पढ़ाई से न सिर्फ स्टूडेंट्स की लेखन शक्ति प्रभावित हो रही है, बल्कि उनकी कल्पनाशीलता और आत्मविश्वास पर भी गहरा प्रभाव पड़ रहा है। आधुनिक शिक्षा व्यवस्था और यूथ की बदलती लाइफस्टाइल को लेकर हमने 1993 बैच के आईआरटीएस अधिकारी अनूप कुमार सत्पति से विस्तार से बात की....
सवालः एक दशक पहले तक आईआईटी और मेडिकल में करियर बनाने का स्टूडेंट्स के बीच काफी क्रेज था, लेकिन बीते सालों में छात्र इन संस्थानों से पढ़ाई पूरी करने के बाद यूपीएससी की ओर कूच कर रहे हैं, इसकी मुख्य वजह क्या है?
जवाबः यह सवाल थोड़ा जटिल है, देखिए दो-तीन चीजें हैं, भारत में रीजनल वेरिएशन काफी अधिक है। पहले गुजरात से सिविल सर्विस में लोग नहीं आते थे, कुछ अन्य राज्यों की स्थिति भी यही थी। औद्योगिक रूप से विकसित राज्यों में लोग यूपीएससी की ओर कम आकर्षित होते हैं। वहीं, नार्थ के राज्यों में इसका क्रेज अधिक है। लोगों को पावर के साथ सिक्योरिटी ऑफ लाइफ, यूपीएससी के लिए प्रेरित करती है। आईआईटी और मेडिकल की पढ़ाई पूरी करने के बाद जो नौकरियां मिलती हैं, वो सिविल सर्विस से बेहतर हैं, लेकिन सामाजिक प्रतिष्ठा, स्टैंडर्ड ऑफ लिविंग और जाॅब सिक्योरिटी के चलते लोग सिविल सर्विस में जाना चाहते हैं। प्राइवेट सेक्टर की इनसिक्योरिटी भी उन्हें यूपीएससी की ओर आकर्षित कर रही है। हालांकि, आजकल के बच्चे विदेश में करियर बनाने को भी प्राथमिकता देते हैं।
सवालः क्वालिटी एजुकेशन की बात होती है, आजकल के स्टूडेंट्स डिग्री तो पूरी कर ले रहे हैं, लेकिन जाॅब नहीं मिल पा रही है, ऐसे छात्र जब एग्जाम या इंटरव्यू में बैठते हैं तो अच्छा स्कोर नहीं कर पाते, इसके पीछे की मुख्य वजह क्या है?
जवाबः हमारे यहां एजुकेशन की क्वालिटी काफी लो है, रीयल एजुकेशन बच्चों को नहीं मिल पा रही है। इसके कई सारे कारण हैं जैसे टीचर्स की क्वालिटी, इंफ्रास्ट्रक्चर आदि। हमारे यहां के बच्चे रट्टा मारकर एग्जाम तो पास कर ले रहे हैं, लेकिन वे इंडस्ट्री की डिमांड के मुताबिक तैयार नहीं हो पा रहे हैं। इसलिए उन्हें योग्यता के मुताबिक नौकरी नहीं मिल पा रही है। आज दुनिया के 300 बेस्ट इंस्टीट्यूट्स में इंडिया का नाम तक नहीं है। पहले इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस का नाम दुनिया की टाॅप 200 यूनिवर्सिटीज में शामिल रहता था, जो आज नहीं है। हमें इसपर ध्यान देने की जरुरत है। देशभर के काॅलेज-यूनिवर्सिटीज को भी क्वालिटी एजुकेशन पर ध्यान देने की जरुरत है।
सवालः गूगल, माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनियां जो पहले इंडियन स्टूडेंट्स को काफी अधिक संख्या में हायर करती थीं, आज उनका प्लेसमेंट रेसियो काफी घट गया है, इसके पीछे की वजह क्या है?
जवाबः अब इसका उल्टा ले-ऑफ हो रहा है। कंपनियां इंडियन स्टूडेंट्स को कम हायर कर रही हैं। इसके कई कारण हैं। इसमें एआई की महत्वपूर्ण भूमिका है। यूएस गर्वमेंट की पाॅलिसी भी भारतीय छात्रों को मिलने वाले मौकों को कम रही है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण भारतीय स्टूडेंटस का स्टैंडर्ड, क्वालिटी एजुकेशन इसके लिए सर्वाधिक जिम्मेदार है।
सवालः एआई का प्रयोग तेजी से बढ़ रहा है, आप इसे जाॅब मेकर के तौर पर मानते हैं या इससे नौकरियां खतरे में पड़ेंगी?
जवाबः सच तो यह है कि इससे नौकरियां घटेंगी। एआई इंप्लीमेंटेशन में थोड़ी डिमांड आएगी लेकिन मैक्सिमम सेक्टर्स की नौकरियों में कमी आएगी। हमें इसके विकल्प तलाशने होंगे। हमें लोगों को नई स्किल से जोड़ना होगा। नई चुनौतियों के लिए तैयार करना होगा ताकि हम इस खतरे से आसानी से नि
पट सकें।

सवालः यूनिवर्सिटी-कॉलेजों में एआई इंप्लीमेंटेशन की बात की जाती है, लेकिन धरातल पर वह कहीं नजर नहीं आता, क्या हमारे पास एक्सपर्टस की कमी है या सुविधाओं की?
जवाबः देखिए हमारे एजुकेशन सिस्टम में आज भी रिसर्च को ज्यादा बढ़ावा नहीं दिया जाता है। इंडिया में काॅपी करने का क्रेज काफी अधिक है। जिन बच्चों के अंदर इनोवेशन का जुनून होता है वे विदेशों का रुख कर लेते हैं। अब हमें इसपर सबसे ज्यादा ध्यान देने की जरुरत है। देश की मल्टीनेशनल कंपनीज के साथ ही समाज को भी इसके लिए आगे आना पड़ेगा, तभी हम पूरी तरह से विकसित हो पाएंगे। इसका एक अच्छा उदाहरण जोहो मेल है। हमें रिसर्च और एजुकेशन पर अधिक निवेश करने की आवश्यकता है।
सवालः हमारे यूथ का शिक्षा से मोहभंग हो रहा है, इसके पीछे की प्रमुख वजह क्या है?
जवाबः हमारी जनरेशन इसके लिए जिम्मेदार है। मैं अपने समय की बात करूं तो पेरेंट्स चाहते थे कि हम मेहनत करके शिक्षा अर्जित करें। आजकल के पेरेंट्स थोड़े लापरवाह हो गए हैं। हमें कंफर्ट में जीने की आदत पड़ गई है। आज बच्चों की बेसिक जरूरतें आसानी से पूरी हो जा रही हैं। इसका नतीजा है कि उनके अंदर से संघर्ष का माद्दा खत्म होता जा रहा है। सोशल मीडिया पर भी बच्चे काफी टाइम बरबाद करते हैं। पेरेंट्स को प्रोटेक्टिव होने की बजाय बच्चों को संघर्षशील बनाने पर जोर देना पड़ेगा।

सवालः सोशल मीडिया एजुकेशन को तबाह करने का एक बड़ा माध्यम है, आपके क्या विचार हैं?
जवाबः जी बिल्कुल, सोशल मीडिया काफी एंटीसोशल काम कर रहा है। यह यंग माइंड को बर्बाद करने का काम कर रहा है। अभी हाल ही में आस्ट्रेलिया में इसके खिलाफ प्रभावी कानून बने हैं। हमें इसपर गंभीरता से विचार करते हुए यूथ के सोशल मीडिया यूज को नियंत्रित करने की जरुरत है।
सवालः न्यू एजुकेशन पाॅलिसी में काफी लचीलापन है, हम डिजिटल एजुकेशन पर फोकस कर रहे हैं, क्या इससे बच्चों की रचनात्मकता और लेखनशक्ति पर प्रतिकूल असर पड़ेगा?
जवाबः इसपर डिबेट की जरुरत है। किताब से अध्ययन करने का विशेष महत्व है। डिजिटल अध्ययन में छात्रों की व्यक्तिगत थिंकिंग डेवलप नहीं होगी। वेस्टर्न कंट्रीज में बच्चों के व्यक्तिगत विचार डेवलप करने पर जोर दिया जाता है। हमारे यहां निश्चित तौर पर नई पाॅलिसी का रिव्यू करने की जरुरत है। सिलेबस और सोर्स के मुताबिक मैटेरियल तैयार करने की आवश्यकता है। न्यू एजुकेशन पाॅलिसी के इंप्लीमेंटेशन के परिणाम कुछ सालों के बाद नजर आएंगे। गूगल की पढ़ाई के मुकाबले किताब से ढूंढकर पढ़ना याददाश्त के लिए काफी अच्छा है।
सवालः लोगों की लाइफस्टाइल तेजी से बदल रही है, नगरीकरण पर फोकस है, एग्रीकल्चर सेक्टर कमजोर होता जा रहा है, भविष्य में इसके क्या परिणाम देखने को मिलेंगे?
जवाबः देखिए मेरा यह मानना है कि हमें गावों की ओर लौटने की जरुरत है। महात्मा गांधी ने ग्राम-स्वराज की बात की थी। गांव को साफ-सुथरा रखना, बेसिक सुविधाएं विकसित करना, हेल्थ सुविधाओं और एजुकेशन को बढ़ावा देना होगा। अत्यधिक नगरीकरण के कारण शहरों में क्राइम, पापुलेशन और गंदगी बढ़ रही है। इसपर विचार करना होगा। हमें शहरों की तर्ज पर ही मूलभूत सुविधाएं गांव में भी विकसित करने की जरुरत है। इससे लोग अपने नेटिव प्लेस पर ही रहने को प्राथमिकता देंगे। एकल परिवार की प्रणाली कमजोर पड़ेगी। लोगों के अंदर लालच, स्वार्थ और शहरों की चकाचैंध के प्रति आकर्षण कमजोर होगा। इससे हमारी समृद्ध भारतीय संस्कृति को प्रभावी होने का मौका मिलेगा। विकसित देश वही है जहां डेवलपमेंट लोगों तक पहुंचता है, लोग डेवलपमेंट के पास नहीं जाते। हमें इसी कांसेप्ट पर काम करने की जरुरत है।

सवालः बीते कुछ सालों में यूपीएससी अधिकारियों ने नौकरी छोड़कर राजनीति में प्रवेश किया है, इससे तैयारी करने वाले यूथ के मन में भी यह सवाल उत्पन्न हो रहा है कि क्या राजनीति सर्वोपरि है?
जवाबः सच तो यह है कि राजनीति बहुत महत्वपूर्ण है। वहां पाॅलिसी बनती है। इसमें दो तरह के लोग होते हैं, कुछ लोग यह सोचते हैं कि पाॅलिटिक्स में जाने से पाॅवर मिलेगा और वे इसे ही जीवन का अंतिम लक्ष्य मानते हैं। जब हम लोग यूपीएससी की परीक्षा पास करके आए थे तो हमारा लक्ष्य समाज की बेसिक व्यवस्थाओं में परिवर्तन लाना हुआ करता था। लोगों के जीवन में बदलाव करने की उम्मीद रहती थी। शायद अब यूपीएससी में जाने के बाद बहुत ज्यादा यह संभव नहीं हो पा रहा है। इससे अधिकारी पाॅलिटिक्स के प्रति आकर्षित हो रहे हैं, ताकि वे लोगों की और ज्यादा मदद कर पाएं। देश की पाॅलिसी में बदलाव ला पाएं। जरुर ऐसे कारण होंगे। कुछ ही केसेज में ऐसे देखा जाता है कि ग्लैमर, पाॅवर और क्विक सक्सेज के लिए लोग पाॅलिटिक्स में जाते हैं। लेकिन वहीं, कुछ लोग रिटायरमेंट के बाद इसमें प्रवेश कर रहे हैं और वे वास्तविकता में समाज निर्माण में सहयोग कर रहे हैं। ऐसे कई अधिकारी हैं, जिन्होंने पाॅलिटिक्स में जाने के बाद काफी अच्छा काम किया है। यूपीएससी के आइडिया को इंप्लीमेंट करके वे देश का भला कर रहे हैं।
सवालः आजकल के बच्चों में धैर्य नहीं है, आत्मविश्वास की भी कमी देखी जाती है, इसे कैसे विकसित करें?
जवाबः एजुकेशन सिस्टम जितना अच्छा होगा समानांतर में ये चीजें भी बढ़ेंगी। हमें भी परवरिश पर ध्यान देना होगा, क्विक सॉल्यूशन और मैटेरियलिस्टिक होने की बजाय हमें खुद भी थोड़ा धैर्य रखना होगा। महात्मा गांधी के विचारों पर गौर करें तो हमें सक्सेस के लिए अपनाए गए रास्तों का सही चुनाव करना होगा। जल्दी सक्सेस पाने के चक्कर में बच्चों का आत्मविश्वास कम होता जा रहा है। मुझे यह बताते हुए खुशी होगी कि मैंने अपने आस-पास बड़े होने वाले बच्चों को धैर्यवान बनाया है। हमें बच्चों को उन्हीं टीचर्स के पास पढ़ने के लिए भेजना चाहिए, जो टीचिंग से मोहब्बत करें न कि उसे नौकरी के रुप में समझें। ऐसे टीचर्स महंगे स्कूलों की जगह सरकारी विद्यालयों में भी मिल सकते हैं। हमें अपने रोल माॅडल के चुनाव में भी मेहनतकश लोगों को तरजीह देने की आवश्यक्ता है। हमें संघर्ष को रोल माॅडल बनाना चाहिए।
सवालः कल्पनाशीलता विकसित करने और इतिहास को जीवंत रखने के लिए स्टूडेंट्स को क्या करना चाहिए?
जवाबः छात्र चाहे जिस लक्ष्य से पढ़ाई कर रहे हों, हिस्ट्री, पॉलिटी, इकोनाॅमी और सोशियोलाॅजी अनिवार्य तौर पर उनके सिलेबस का हिस्सा होना चाहिए। फाॅरेन के यूनिवर्सिटीज में इतिहास उनके सिलेबस का अहम हिस्सा है। वे वर्ल्ड हिस्ट्री पर फोकस करते हैं। हिस्ट्री ह्यूमन जर्नी का जो आउटलुक हमें देती है, वह कोई अन्य सब्जेक्ट नहीं दे सकता। यह हमारा आत्मविश्वास बढ़ाने के साथ ही नर्वसनेस खत्म करता है और धैर्य विकसित करता है।
सवालः न्यू एजुकेशन पाॅलिसी लागू होने के बाद शिक्षकों और बच्चों दोनों को कई तरह की आशंकाएं हैं, बच्चों के भविष्य पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है, इसे कैसे व्यवस्थित कर सकते हैं?
जवाबः पाॅलिसी पर डिबेट होने के साथ ही इसमें जरुरी बदलावों को लागू किया जाना चाहिए।
सवालः वर्तमान शिक्षा प्रणाली क्या बच्चों की उम्र और मानसिक स्तर से ऊपर है?
जवाबः बच्चों पर प्रेशर है। हम लोग उन्हें सबकुछ मिलाकर एकसाथ पढ़ा देना चाहते हैं। हमें इस तौर-तरीके पर विचार करने की आवश्यकता है। बच्चों की समझ और जरुरत के मुताबिक सब्जेक्ट का बोझ हल्का करना चाहिए। अनावश्यक चीजों का हटना भी उन्हें रिलैक्स महसूस करा सकता है।
सवालः पढ़ाई के साथ खेल का तालमेल कितना जरुरी है?
जवाबः खेल बहुत आसानी से चीजों को पढ़ा देता है जो क्लासरूम में संभव नहीं है। पढ़ाई के साथ खेल का ताल-मेल बहुत जरूरी है। स्कूूल एक्टीविटी का पार्ट खेल भी है। हमें इसको बढ़ावा देने की जरूरत है। इसमें सभी तरह के आउटडोर गेम्स शामिल हैं।
सवालः बच्चे ऑनलाइन गेम्स और मोबाइल गेम्स पर फोकस करते हैं, इससे उनकी शारिरिक और मानसिक हेल्थ खराब हो रही है?
जवाबः हमें इसे खेल की मान्यता नहीं देनी चाहिए, खेल का मतबल होता है, शरीर से पसीना बहना चाहिए। ऑनलाइन गेम्स पर रोक लगाने की जरुरत है। इससे बच्चों का बहुत नुकसान हो रहा है। उन्हें मेंटल, न्यूरोलॉजिकल और अन्य हेल्थ इश्यूज का सामना करना पड़ रहा है। मुझे विश्वास है कि जल्द ही इसपर कोई न कोई कानून अवश्य बनेगा।
सवालः यूपीएससी की तैयारी करने वाले स्टूडेंटस को चिड़चिड़ापन से बचने और पढ़ाई में मन लगाए रखने के लिए क्या करना चाहिए?
जवाबः हमारे समय में हम लोग जो पढ़ते थे उसी पर डिस्कशन करते थे। स्टूडेंटस को अपने लेवल के लोगों से ज्यादा इंट्रैक्ट करना चाहिए। बड़े दार्शनिक को सुनना चाहिए। शारीरिक रुप से एक्टिव रहना बेहद जरुरी है। इसमें वाॅक करना, साइकिलिंग, बैडमिंटन खेलना आदि शामिल है। इससे मेंटल हेल्थ सुधरेगी और चिड़चिड़ापन दूर होगा। तैयारी में काफी सहायता होगी।
सवालः यूपीएससी में लिखित परीक्षा के आधार पर सिलेक्शन होता है, लेकिन आजकल ज्यादातर यूनिवर्सिटीज में एमसीक्यू माॅडल में ग्रेजुएशन की पढ़ाई होती है, इससे छात्रों की लेखन और चिंतन शक्ति खराब हो जा रही है, भविष्य में हमें कैसे खतरों का सामना करना पड़ेगा?
जवाबः जी बिल्कुल, यह बड़ा गैप बनता जा रहा है। बच्चों की बौद्धिक क्षमता खत्म होती जा रही है। एमसीक्यू रट्टा मारने वालों के लिए है। यह नई सोच, नए विचार और कल्पनाशीलता की राह में स्पीड ब्रेकर है। इसपर विचार करने की जरुरत है। इस व्यवस्था को परिवर्तित करना चाहिए। काॅलेज व स्कूल लेवल पर तो एमसीक्यू होना ही नहीं चाहिए।











