कर्मचारियों को सांता क्लॉज की टोपी पहनने पर मजबूर करना न्यायसंगत नहीं- हाई कोर्ट: आगरा के वी-बाजार का मामला, याचिकाकर्ता के खिलाफ दर्ज हुई थी एफआईआर

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कार्यस्थल पर कर्मचारियों को सांता क्लॉज की लाल टोपी पहनने के लिए मजबूर करने के खिलाफ चेतावनी दी है। कोर्ट ने कहा है कि ऐसी बाध्यता विभिन्न धर्मों और आस्था वाले लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचा सकती है।
न्यायालय ने कहा कि देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में इस तरह की कार्रवाई की अनुमति नहीं है जहां प्रत्येक नागरिक को अपनी आस्था और विश्वास का पालन करने की स्वतंत्रता है। न्यायमूर्ति सौरभ श्रीवास्तव ने यह टिप्पणी आरोपी विक्रम सिंह उर्फ विश्व विक्रम सिंह की ओर से दायर याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए की। याचिका में आरोपपत्र संज्ञान लेने/समन जारी करने के आदेश और आपराधिक कार्यवाही को चुनौती दी गई थी।
कर्मचारियों को लाल टोपी पहनने के लिया किया था मजबूर
याचिकाकर्ता के खिलाफ आईपीसी की धारा 298 (किसी व्यक्ति की धार्मिक भावनाओं को जानबूझकर ठेस पहुंचाने) और धारा 504 (शांति भंग करने के इरादे से जानबूझकर अपमान करना) के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी। आरोपों के अनुसार आगरा स्थित वी-बाजार में काम करने वाले याचिकाकर्ता ने अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को सांता क्लॉज की लाल टोपी पहनने के लिए मजबूर किया था।
भविष्य में ऐसे निर्देश से बचने की चेतावनी
याचिकाकर्ता ने आरोपपत्र, समन आदेश और पूरी आपराधिक कार्यवाही को चुनौती देते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट का रुख किया था। याचिका के साथ दाखिल दस्तावेजों की जांच करते हुए न्यायालय ने कहा कि यह स्पष्ट है कि वी-बाजार के वरिष्ठ अधिकारियों ने कर्मचारियों पर ऐसी बाध्यता बनाई थी। कोर्ट ने कहा कि टोपी पहनने के लिए मजबूर करना विभिन्न धर्मों और आस्थाओं की भावनाओं को किसी न किसी रूप में आहत कर सकता है। देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसी कार्रवाई की अनुमति नहीं है, जहां प्रत्येक व्यक्ति को अपनी आस्था और विश्वास का पालन करने की स्वतंत्रता है। न्यायालय ने याचिकाकर्ता और उसके वरिष्ठ अधिकारियों को भविष्य में इस तरह के निर्देश दोहराने से बचने की चेतावनी भी दी। अदालत ने कहा कि ऐसे निर्देश कर्मचारियों के बीच कार्यस्थल के शांतिपूर्ण और सौहार्दपूर्ण माहौल को प्रभावित कर सकते हैं।
कोर्ट ने कहा- मजिस्ट्रेट ने कानूनी त्रुटी की है
आपराधिक कार्यवाही को चुनौती दिए जाने के संबंध में याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने दलील दी कि आईपीसी की धाराएं 298 और 504 गैर-संज्ञेय अपराध हैं। दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 2(डी) के स्पष्टीकरण (मजिस्ट्रेट को मौखिक या लिखित रूप से किए गए किसी आरोप) का उल्लेख करते हुए न्यायालय ने कहा कि इस मामले में जांच अधिकारी द्वारा आईपीसी की धाराओं 298 और 504 के तहत दाखिल आरोपपत्र को शिकायत के रूप में माना जाएगा और उसी के अनुसार इसका निस्तारण किया जाएगा। हाई कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट ने मामले में राज्य मुकदमे के रूप में संज्ञान लेकर कानूनी त्रुटि की है। इसके बाद न्यायालय ने आगरा के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) द्वारा दिसंबर 2023 में जारी समन आदेश को याचिकाकर्ता के संबंध में रद कर दिया और याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया।










