Menstrual Hygiene Day: सात रुपये के पैड से बदली हजारों महिलाओं की तकदीर, इशु और अरुणा की पहल बनी मिसाल

देशभर में 28 मई को मासिक धर्म स्वच्छता दिवस मनाया जाता है। पूरे देश में महिलाओं की सेहत और स्वच्छता को लेकर जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं। वहीं दो भारतीय महिलाओं की पहल आज हजारों महिलाओं के लिए उम्मीद और बदलाव की नई कहानी बन चुकी है। जयपुर की इशु सैनी और हैदराबाद की अरुणा दारा ने पीरियड्स से जुड़ी दो बड़ी चुनौतियों महंगे सैनिटरी पैड और पर्यावरण प्रदूषण का ऐसा समाधान तैयार किया है। जिसने न केवल महिलाओं को सस्ती और सुरक्षित सुविधा दी, बल्कि रोजगार और पर्यावरण संरक्षण का भी नया मॉडल खड़ा कर दिया है।
भारत में आज भी बड़ी संख्या में महिलाएं और किशोरियां पीरियड्स के दौरान स्वच्छता संबंधी संसाधनों से वंचित रहती हैं। ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग की महिलाओं के लिए महंगे सैनिटरी पैड खरीदना आसान नहीं होता है। दूसरी ओर बाजार में उपलब्ध अधिकांश पैड प्लास्टिक आधारित होते हैं, जो पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा बन चुके हैं। एक्सपर्ट्स के मुताबिक एक सामान्य सैनिटरी पैड को पूरी तरह नष्ट होने में सैकड़ों साल लग सकते हैं। ऐसे में हर साल करोड़ों इस्तेमाल किए गए पैड कचरे और प्रदूषण का बड़ा कारण बनते हैं।
कपड़े से तैयार किए गए री-यूजेबल सैनिटरी पैड
इन्हीं समस्याओं को करीब से देखने के बाद जयपुर की इशु सैनी ने बदलाव की दिशा में कदम बढ़ाया है। उन्होंने कपड़े से बने री-यूजेबल सैनिटरी पैड तैयार करने शुरू किए। जिन्हें बार-बार इस्तेमाल किया जा सकता है। खास बात यह है कि ये पैड पूरी तरह प्लास्टिक-फ्री हैं। लगभग दो वर्षों तक उपयोग किए जा सकते हैं। इशु ने केवल उत्पाद तैयार करने तक खुद को सीमित नहीं रखा है। महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों को इस काम से जोड़कर रोजगार के नए अवसर भी पैदा किए हैं। आज कई महिलाएं इन पैड्स के निर्माण से आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन रही हैं।
केले के रेशों से तैयार हुआ पर्यावरण अनुकूल विकल्प
हैदराबाद की अरुणा दारा ने भी इसी दिशा में एक अनोखी पहल की है। उन्होंने केले के रेशों जैसे प्राकृतिक पदार्थों का इस्तेमाल कर बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी पैड तैयार किए हैं। इन पैड्स की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इस्तेमाल के बाद ये आसानी से मिट्टी में घुल जाते हैं और पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं। अरुणा ने यह सुनिश्चित करने की कोशिश की कि ये पैड आम महिलाओं की पहुंच में हों, इसलिए उनकी कीमत करीब सात से आठ रुपये प्रति पैड रखी गई। कम कीमत और पर्यावरण के अनुकूल होने के कारण इन पैड्स को तेजी से स्वीकार किया जाने लगा है।
छोटे प्रयास से बना बड़ा अभियान
जो पहल कभी छोटे स्तर से शुरू हुई थी। वह अब कई राज्यों तक फैल चुकी है। वर्तमान में पांच राज्यों में करीब 13 उत्पादन इकाइयां संचालित हो रही हैं। 300 से अधिक महिलाओं को रोजगार मिला है। यह मॉडल केवल महिला स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रहा है। सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण का माध्यम भी बन गया है। ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाएं अब खुद उत्पादन से जुड़कर आय अर्जित कर रही हैं और दूसरी महिलाओं को भी जागरूक कर रही हैं।
ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर भी उपलब्ध हो रहे प्रोडक्ट्स
इन दोनों महिला उद्यमियों को वॉलमार्ट वृद्धि कार्यक्रम से भी सहयोग मिला है। जिससे उनके उत्पादों को व्यापक बाजार और पहचान मिली है। इशु सैनी का कारोबार अब लगभग एक करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। अरुणा दारा के उत्पाद ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के जरिए देशभर में उपलब्ध हो रहे हैं। उनकी यह पहल साबित करती है कि सामाजिक संवेदनशीलता और नवाचार के जरिए छोटे प्रयास भी बड़े बदलाव का कारण बन सकते हैं। आज मासिक धर्म स्वच्छता दिवस पर इशु सैनी और अरुणा दारा की कहानी केवल प्रेरणा नहीं, बल्कि इस बात का उदाहरण है कि सही सोच और मजबूत संकल्प के साथ समाज और पर्यावरण दोनों के लिए सकारात्मक बदलाव संभव है।
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