नवजात शिशुओं के लिए डब्ल्यूएचओ ने दी मलेरिया की दवा को मंजूरी : लाखों बच्चों की जिंदगी बचाने की उम्मीद, टाइम पर हो सकेगा ट्रीटमेंट

दुनिया भर में मलेरिया से जूझ रहे नवजात शिशुओं के लिए एक बड़ी राहत की खबर आई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पहली बार ऐसी दवा को मंजूरी दी है जो खास तौर पर शिशुओं के लिए तैयार की गई है। अब तक छोटे बच्चों का इलाज उन्हीं दवाओं से किया जाता था जो वयस्कों के लिए बनाई गई थीं। इससे डोज में गलती और साइड इफेक्ट का खतरा बना रहता था। नई दवा के आने से यह समस्या काफी हद तक दूर हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे हर साल लाखों बच्चों की जान बचाई जा सकेगी।
मलेरिया आज भी दुनिया के लिए एक बड़ी स्वास्थ्य चुनौती बना हुआ है। यह बीमारी मच्छरों के जरिए फैलती है। खासकर बारिश के मौसम में इसका खतरा तेजी से बढ़ जाता है। साल 2024 में दुनिया के करीब 80 देशों में 28.2 करोड़ मलेरिया के मामले सामने आए। इनमें से करीब 6.10 लाख लोगों की मौत हुई। पिछले साल की तुलना में मामलों में बढ़ोतरी दर्ज की गई। सबसे ज्यादा असर अफ्रीकी देशों में देखा गया है। यहां पांच साल से कम उम्र के बच्चों में मौत का आंकड़ा 75% तक पहुंच जाता है।
शिशुओं के लिए पहली विशेष दवा
नई दवा आर्टेमेथर और ल्यूमेफैंट्रिन का कॉम्बिनेशन है। यह पहली ऐसी दवा है, जिसे खासतौर पर पांच किलोग्राम से कम वजन वाले नवजात शिशुओं के लिए तैयार किया गया है। इस दवा को डब्ल्यूएचओ की प्री-क्वालिफिकेशन मंजूरी मिली है। इसका मतलब है कि यह दवा गुणवत्ता, सुरक्षा और प्रभाव के अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरी उतरी है। इससे अब शिशुओं को सही और सुरक्षित इलाज मिल सकेगा।
विश्व मलेरिया दिवस पर बड़ा कदम
हर साल 25 अप्रैल को विश्व मलेरिया दिवस मनाया जाता है। इस मौके पर इस दवा को मंजूरी मिलना एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। इसका उद्देश्य मलेरिया के प्रति जागरूकता बढ़ाना और इसके खिलाफ वैश्विक प्रयासों को मजबूत करना है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम मलेरिया से होने वाली मौतों को कम करने में अहम भूमिका निभाएगा।
डब्ल्यूएचओ प्रमुख का बयान
डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक टेड्रोस अधानोम घेब्रेयेसस ने इस फैसले को ऐतिहासिक बताया है। उन्होंने कहा कि सदियों से मलेरिया नवजात शिशुओं की जान लेता आया है लेकिन अब स्थिति बदल रही है। नए टीके, बेहतर जांच और प्रभावी दवाओं की मदद से इस बीमारी पर काबू पाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि मलेरिया को खत्म करना अब सिर्फ सपना नहीं बल्कि संभव लक्ष्य बन गया है।
नए डायग्नोस्टिक टेस्ट को भी मंजूरी
डब्ल्यूएचओ ने हाल ही में मलेरिया के तीन नए रैपिड डायग्नोस्टिक टेस्ट (आरडीटी) को भी मंजूरी दी है। ये टेस्ट नए प्रकार के मलेरिया स्ट्रेन्स की पहचान करने में सक्षम हैं। पहले के टेस्ट कई मामलों में बीमारी को पकड़ नहीं पा रहे थे। नई तकनीक इस कमी को दूर करती है। इससे समय पर इलाज शुरू किया जा सकेगा।
गर्भवती महिलाओं के लिए भी खतरा
मलेरिया सिर्फ बच्चों के लिए ही नहीं, बल्कि गर्भवती महिलाओं के लिए भी खतरनाक है। हर साल करीब 10 हजार गर्भवती महिलाओं की मौत मलेरिया के कारण होती है। इसके अलावा दो लाख से ज्यादा बच्चों का जन्म मृत अवस्था में होता है। करीब 5.5 लाख बच्चे कम वजन के साथ पैदा होते हैं। इससे उनके स्वास्थ्य पर लंबे समय तक असर पड़ता है।
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