गोरखपुर में सावन का पहला सोमवार: मुक्तेश्वरनाथ में उमड़ा आस्था का सैलाब, भक्तों ने शिवलिंग पर चढ़ाया जल

सावन के पहले सोमवार पर शहर के प्रमुख शिवालयों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। सुबह से ही मुक्तेश्वरनाथ मंदिर समेत अन्य शिव मंदिरों में दर्शन और जलाभिषेक के लिए भक्तों का तांता लगा रहा। भोर से शुरू हुई कतारें दिनभर बनी रहीं। मंदिर परिसर "हर-हर महादेव" और "बोल बम" के जयकारों से गूंजता रहा। पहले सावन सोमवार के अवसर पर श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह और गहरी आस्था देखने को मिली।
पहले सोमवार का विशेष महत्व होने के कारण बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर पहुंचे। महिलाओं ने परिवार की सुख-समृद्धि और पति की दीर्घायु की कामना के साथ भगवान शिव का जलाभिषेक किया। वहीं युवाओं ने बेहतर भविष्य, सफलता और मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए पूजा-अर्चना की। श्रद्धालुओं ने गंगाजल, दूध, बेलपत्र, धतूरा, भांग, फूल और फल अर्पित कर विधि-विधान से अभिषेक किया। पूरे दिन मंदिरों में भक्तिमय वातावरण बना रहा और श्रद्धालु उत्साह के साथ भगवान भोलेनाथ के दर्शन करते रहे।

बांसी के राजा की आस्था से जुड़ा है मंदिर का इतिहास
मंदिर के इतिहास से जुड़ी मान्यता के अनुसार, लगभग चार सौ वर्ष पहले यहां घना जंगल हुआ करता था। एक बार बांसी स्टेट के राजा शिकार के लिए इस क्षेत्र में आए। इसी दौरान जंगल में शेरों ने उन्हें घेर लिया। स्वयं को संकट में देखकर राजा ने अपने इष्टदेव भगवान शिव का स्मरण किया। मान्यता है कि भगवान की कृपा से शेर वापस लौट गए और राजा की जान बच गई। इस चमत्कार के बाद राजा ने उसी स्थान पर भगवान शिव का मंदिर बनवाने का संकल्प लिया। उनके निर्देश पर महाराष्ट्र निवासी बाबा काशीनाथ ने यहां मंदिर की स्थापना कराई। बाद में उन्होंने मंदिर की देखरेख की जिम्मेदारी नौसड़ के समीप पेवनपुर निवासी यदुनाथ उपाध्याय को सौंपी और तीर्थयात्रा पर निकल गए। तब से उनके परिवार के सदस्य ही मंदिर की सेवा और व्यवस्थाओं का दायित्व संभालते आ रहे हैं।

मुक्तिधाम के कारण पड़ा 'मुक्तेश्वरनाथ' नाम
मंदिर का नाम 'मुक्तेश्वरनाथ' पड़ने के पीछे भी धार्मिक मान्यता जुड़ी है। मंदिर के समीप स्थित मुक्तिधाम के कारण इसे मुक्तेश्वरनाथ के नाम से पहचान मिली। समय के साथ यह स्थान शिवभक्तों की आस्था का प्रमुख केंद्र बन गया। विशेष रूप से सावन और महाशिवरात्रि के अवसर पर यहां श्रद्धालुओं की लंबी कतारें देखने को मिलती हैं। आसपास के जिलों के अलावा प्रदेश के अन्य हिस्सों से भी भक्त भगवान भोलेनाथ का जलाभिषेक करने पहुंचते हैं।

धार्मिक अनुष्ठानों का है प्रमुख केंद्र
मुक्तेश्वरनाथ मंदिर केवल दर्शन-पूजन तक सीमित नहीं है बल्कि यहां विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान भी नियमित रूप से कराए जाते हैं। संतान प्राप्ति और आरोग्यता की कामना लेकर बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां विशेष पूजन और अनुष्ठान कराते हैं। पहले यहां केवल भगवान शिव का मंदिर था। लेकिन बाद में हुए विस्तार के दौरान शिव परिवार, मां दुर्गा और भगवान हनुमान की प्रतिमाएं भी स्थापित की गईं। मंदिर परिसर में स्थित प्राचीन कुआं और पीपल का वृक्ष आज भी श्रद्धालुओं की विशेष आस्था का केंद्र हैं। यहां मांगलिक कार्यक्रम, मुंडन संस्कार, वर-वधू परिचय और हवन जैसे धार्मिक आयोजन भी होते हैं। गर्भगृह के चारों ओर बना बरामदा भजन-कीर्तन और धार्मिक आयोजनों के लिए उपयोग किया जाता है।

महाशिवरात्रि पर पूरी रात होती है पूजा-अर्चना
सामान्य दिनों में मंदिर में प्रतिदिन सुबह सात बजे और शाम आठ बजे नियमित आरती होती है। वहीं महाशिवरात्रि के अवसर पर यहां पूरी रात धार्मिक अनुष्ठानों का क्रम चलता है। रात नौ बजे, मध्यरात्रि 12 बजे, भोर तीन बजे और सुबह छह बजे विशेष आरती आयोजित की जाती है। इस दौरान श्रद्धालु भगवान शिव का जलाभिषेक, रुद्राभिषेक और पूजन करने के बाद मंदिर परिसर में लगने वाले मेले का भी आनंद लेते हैं। रंगभरी एकादशी का पर्व भी यहां श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है।

दूर-दूर से आते हैं श्रद्धालु
महंत रामनाथ उपाध्याय ने बताया कि मुक्तेश्वरनाथ मंदिर की मान्यता पूरे पूर्वांचल में है। आजमगढ़, वाराणसी सहित कई जिलों से श्रद्धालु यहां भगवान शिव का जलाभिषेक करने और दर्शन के लिए पहुंचते हैं। उनका कहना है कि अनेक श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूरी होने के बाद दोबारा बाबा के दरबार में धन्यवाद देने आते हैं। मंदिर में नियमित रूप से रुद्राभिषेक, जलाभिषेक और अन्य धार्मिक अनुष्ठान होते हैं। सावन के सोमवार और महाशिवरात्रि पर यहां श्रद्धालुओं की सबसे अधिक भीड़ उमड़ती है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी सावन और महाशिवरात्रि के अवसर पर मुक्तेश्वरनाथ मंदिर पहुंचकर भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं। इस वर्ष सावन में चार सोमवार पड़ रहे हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए सावन माह में कठोर तप और सोमवार का व्रत किया था। तभी से सावन के सोमवार का विशेष महत्व माना जाता है। मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक सावन सोमवार का व्रत और भगवान शिव की पूजा करने से पूरे वर्ष की आराधना के समान पुण्य फल प्राप्त होता है।

मंदिर की प्राचीनता आज भी सुरक्षित
पुजारी राजेश कुमार मिश्र ने बताया कि वह पिछले 40 वर्षों से यहां पूजा-अर्चना कर रहे हैं। उनके अनुसार मंदिर की स्थापना लगभग 500 वर्ष पुरानी मानी जाती है। सावन भगवान शिव का विशेष प्रिय महीना है, इसलिए इस दौरान भक्तों की संख्या कई गुना बढ़ जाती है। उन्होंने बताया कि मंदिर की चौखट पर पाली भाषा में अंकित शिलालेख मौजूद है, जिसकी पुष्टि पुरातत्व विभाग भी कर चुका है। उनका कहना है कि बाबा मुक्तेश्वरनाथ के दरबार में आने वाले श्रद्धालु अटूट श्रद्धा के साथ अपनी मनोकामनाएं लेकर आते हैं और यही विश्वास इस प्राचीन मंदिर की सबसे बड़ी पहचान है।
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