गोरखपुर में सावन के दूसरे सोमवार में शिवालयों में उमड़ी आस्था: मंदिरों में गूंजे हर-हर महादेव के जयकारे, 300 साल पहले हुई थी झारखंडी शिव मंदिर की स्थापना

गोरखपुर|

जिले में सावन के दूसरे सोमवार को शिवालयों में आस्था का सैलाब उमड़ पड़ा। सुबह की आरती के बाद मंदिरों में जलाभिषेक का सिलसिला शुरू हो गया, जो पूरे दिन चलता रहा। सुबह होते ही शहर के प्रमुख मंदिरों में श्रद्धालुओं की कतारें लग गईं। महादेव झारखंडी मंदिर समेत अन्य शिवालयों में बड़ी संख्या में भक्त पहुंचे।

मंदिर परिसर दिनभर हर-हर महादेव और बोल बम के जयकारों से गूंजते रहे। श्रद्धालुओं ने भगवान शिव का जलाभिषेक कर पूजा-अर्चना की और अपनी मनोकामनाओं के लिए प्रार्थना की। इस दौरान परिवार के साथ पहुंचे लोगों ने अपने बच्चों के लिए मन्नतें भी मांगीं। एक महिला श्रद्धालु ने कहा कि भगवान शिव के आशीर्वाद से उसकी हर मुराद पूरी हुई है।

कई जिलों से करीब दो लाख आते हैं श्रद्धालु

शहर के झारखंडी क्षेत्र में स्थित महादेव झारखंडी मंदिर पूर्वांचल के सबसे प्राचीन और प्रसिद्ध शिवधामों में शुमार है। ऐतिहासिक झारखंडी शिव मंदिर की स्थापना लगभग 300 साल पहले हुई थी। सावन का महीना शुरू होते ही यहां आस्था का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। गोरखपुर के अलावा महराजगंज, देवरिया, कुशीनगर, संतकबीरनगर, सिद्धार्थनगर, बस्ती और आसपास के कई जिलों से करीब दो लाख श्रद्धालु भगवान शिव का जलाभिषेक और रुद्राभिषेक करने पहुंचते हैं। पूजा-अर्चना के बाद श्रद्धालु मंदिर परिसर में लगने वाले मेले का भी आनंद उठाते हैं। इस मंदिर का इतिहास और यहां से जुड़ी मान्यताएं इसे अन्य शिवालयों से अलग पहचान दिलाती हैं।

मुख्य पुजारी इंद्रेश गिरि।
मुख्य पुजारी इंद्रेश गिरि।

कुल्हाड़ी के वार से प्रकट हुआ स्वयंभू शिवलिंग

मुख्य पुजारी इंद्रेश गिरि ने बताया कि वर्षों पहले यह पूरा इलाका घने जंगल से घिरा हुआ था। उस समय लकड़हारे जंगल से लकड़ी काटकर अपना जीवनयापन करते थे। पुराने लोगों के अनुसार एक लकड़हारा पेड़ काट रहा था। इसी दौरान उसकी कुल्हाड़ी जमीन में दबे एक पत्थरनुमा हिस्से से टकराई। जैसे ही कुल्हाड़ी लगी, वहां से रक्त की धारा बहने लगी। यह देखकर लकड़हारा घबरा गया। उसने उस पत्थर को बाहर निकालने का प्रयास किया, लेकिन जितनी बार वह उसे ऊपर उठाने की कोशिश करता, वह उतना ही जमीन में धंसता चला जाता। घबराकर उसने गांव पहुंचकर पूरी घटना लोगों को बताई।

जमींदार को आया सपना

उसी रात क्षेत्र के तत्कालीन जमींदार गब्बू दास को भगवान भोलेनाथ ने स्वप्न दिया। सपने में उन्होंने बताया कि झारखंडी में स्वयंभू शिवलिंग प्रकट हुआ है। अगले दिन जमींदार स्थानीय लोगों के साथ मौके पर पहुंचे और शिवलिंग को जमीन से ऊपर निकालने का प्रयास किया, लेकिन कोई सफलता नहीं मिली। इसके बाद शिवलिंग पर दूध से अभिषेक किया गया और विधि-विधान से पूजा-अर्चना शुरू कर दी गई। तभी से यहां नियमित पूजा होती आ रही है। आज भी शिवलिंग पर कुल्हाड़ी के निशान स्पष्ट दिखाई देते हैं। मुख्य पुजारी के अनुसार, घने जंगल और पत्तों से ढके रहने के कारण इस स्थान का नाम महादेव झारखंडी पड़ा।

छत बनाने की कोशिश नाकाम

झारखंडी महादेव मंदिर की एक और विशेषता यह है कि स्वयंभू शिवलिंग आज भी खुले आसमान के नीचे विराजमान है। समिति के अनुसार कई बार शिवलिंग के ऊपर स्थायी छत बनाने का प्रयास किया गया, लेकिन हर बार किसी न किसी कारण से निर्माण कार्य पूरा नहीं हो सका। इसके बाद श्रद्धालुओं ने इसे भगवान की इच्छा मानते हुए शिवलिंग को प्राकृतिक स्वरूप में ही रहने दिया। आज शिवलिंग के ऊपर पीपल के पेड़ की छाया रहती है, जिसे श्रद्धालु भी विशेष महत्व देते हैं।

सावन और शिवरात्रि में उमड़ता है सैलाब

सावन के पूरे महीने और महाशिवरात्रि के अवसर पर मंदिर में सुबह से देर रात तक श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लगी रहती हैं। दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालु जलाभिषेक, रुद्राभिषेक, महामृत्युंजय जाप और विशेष अनुष्ठान कराते हैं। मान्यता है कि यहां सच्चे मन से भगवान शिव का जलाभिषेक करने वाले भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और जीवन के कष्ट दूर हो जाते हैं। पूजा के बाद श्रद्धालु मंदिर परिसर में लगने वाले मेले का भी आनंद लेते हैं।

सेविका निखलेश गिरि।
सेविका निखलेश गिरि।

मंदिर सेवा को मानती हूं सौभाग्य: निखलेश गिरि

सेविका निखलेश गिरि ने बताया कि वह नियमित रूप से मंदिर की साफ-सफाई और व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी संभालती हैं। सावन में श्रद्धालुओं की संख्या काफी बढ़ जाती है, इसलिए पूरे परिसर की व्यवस्था बनाए रखना बड़ी जिम्मेदारी होती है। भगवान शिव की सेवा करना उनके लिए सौभाग्य की बात है और वह पूरी श्रद्धा के साथ यह कार्य करती हैं। मंदिर परिसर की स्वच्छता और व्यवस्थाओं पर विशेष ध्यान दिया जाता है। उनका कहना है कि बाबा की सेवा करना उनके लिए पूजा के समान है और यही उन्हें आत्मिक शांति का अनुभव कराता है।

पुजारी अनिल तिवारी।
पुजारी अनिल तिवारी।

रुद्राभिषेक के लिए उमड़ती है भीड़ : अनिल तिवारी

पुजारी अनिल तिवारी ने बताया कि वह कई वर्षों से मंदिर में रुद्राभिषेक, महामृत्युंजय जाप, कथा और अन्य धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराते आ रहे हैं। सावन के शुक्ल पक्ष से श्रद्धालुओं की संख्या और बढ़ जाती है। बड़ी संख्या में युवा भी भगवान शिव की पूजा-अर्चना और अभिषेक के लिए पहुंचते हैं तथा परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। उन्होंने बताया कि सावन में प्रतिदिन विशेष पूजन, अभिषेक और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच धार्मिक अनुष्ठान संपन्न होते हैं।

श्रद्धालु विभा राय।
श्रद्धालु विभा राय।

श्रद्धालु विभा राय ने बताया कि मैं पूरे सावन भगवान शिव का व्रत रखती हूं और नियमित रूप से इस मंदिर में दर्शन करने आती हूं। भगवान शिव से मेरी प्रार्थना है कि देश की बेटियां सुरक्षित रहें, समाज में शांति बनी रहे और हर परिवार सुखी एवं समृद्ध रहे।

श्रद्धालु अमृता त्रिपाठी।
श्रद्धालु अमृता त्रिपाठी।

श्रद्धालु अमृता त्रिपाठी ने कहा कि विवाह से पहले भी मैं सावन सोमवार का व्रत रखती थी और आज भी पूरी श्रद्धा से व्रत रखती हूं। मेरा विश्वास है कि सच्चे मन से की गई भगवान शिव की आराधना कभी व्यर्थ नहीं जाती। इस बार भी मैं यहां रुद्राभिषेक कराने आई हूं।

श्रद्धालु कामिनी वर्मा।
श्रद्धालु कामिनी वर्मा।

श्रद्धालु कामिनी वर्मा ने कहा कि सावन भगवान शिव की आराधना, सनातन परंपरा और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है। इस महीने में कांवड़ यात्रा, पूजा-अर्चना और धार्मिक आयोजनों के माध्यम से समाज एकजुट होता है। वह स्वयं भी वर्षों से सावन व्रत और सांस्कृतिक सेवा से जुड़ी हैं।

श्रद्धालु मंजू पाठक।
श्रद्धालु मंजू पाठक।

श्रद्धालु मंजू पाठक ने कहा कि मेरी मनोकामना पूरी होने के बाद मैं हर वर्ष इस मंदिर में रुद्राभिषेक कराने आती हूं। यहां का वातावरण मन को अपार शांति देता है। बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी पूरे श्रद्धाभाव से भगवान शिव की पूजा करते हैं।

श्रद्धालु सिद्धार्थ पाठक।
श्रद्धालु सिद्धार्थ पाठक।

श्रद्धालु सिद्धार्थ पाठक ने बताया कि मैं पिछले एक सप्ताह से चल रहे विशेष रुद्राभिषेक में शामिल था। आज अनुष्ठान का अंतिम दिन था। भगवान शिव में मेरी गहरी आस्था है। मैं परिवार की सुख-समृद्धि और समाज के कल्याण की कामना के साथ नियमित रूप से यहां दर्शन करने आता हूं।

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